सूचनाओं को हथियार बना रहे हैं
कुछ छाप रहे हैं कुछ छिपा रहे हैं
अखबार के शब्दों ने कालों से यारी कर ली है
काले हैं की आवाज को खा रहे हैं
दिल मानता नहीं किसी का कहना
उद्दंडता दिमाग पर बैठी है
सुबह की खबर
शाम तक असर खो देती है
लिखने की नौकरी
व्यापार का कागज
सेठजी की गद्दी रद्दी पर ऐंठी है
नम्रता विनय नमस्ते का लबादा
चेहरा पुता है पीले से
कोरा कागज ही बाँट देते
बच्चों को
कुछ नया लिखने को
रविवार, 26 जून 2011
सोमवार, 20 जून 2011
arunesh: है कैसा वो ये सब सोच
arunesh: है कैसा वो ये सब सोच: "काया को बस कब्र चाहिए तू क्या चाहे ये तू सोच सोच की आखिर सच क्या तेरा काया के सच को मत सोच"
है कैसा वो ये सब सोच
काया को बस कब्र चाहिए तू क्या चाहे ये तू सोच
सोच की आखिर सच क्या तेरा काया के सच को मत सोच
सोच की आखिर सच क्या तेरा काया के सच को मत सोच
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