रविवार, 9 सितंबर 2012

कपिल के गुस्से में है इस देश के उन्मुक्तों का भविष्य
कपिल देव गुस्से में हैं. उनके गुस्से के जिम्मेदार हालिया अंडर-19 क्रिकेट टीम के हीरो रहे उन्मुक्त चन्द्र हैं. और उन्मुक्त से जुड़े वे सरे लोग हैं जिन्होंने जानने समझने के बाद भी उन्मुक्त को बेंगलुरु में प्रैक्टिस कैम्प में जाने को प्रेरित नहीं किया. उन्मुक्त अभी इतना समझदार नहीं है की वो सारे फैसले सही ही ले सके. इसलिए उसकी गलती माफ़ी के लायक है. अब ये सवाल उठता है कि कपिल का ये गुस्सा किसके लिए था. क्या यह गुस्सा उन्मुक्त के माता-पिता और उसके कोच पर या उस मीडिया हाउस पर था जिसने इस प्रोग्राम को आयोजित किया. क्या उस मीडिया हाउस के थिंक टैंक को ये पता नहीं था कि उन्मुक्त के लिए क्या जरुरी था - यूथ summit या प्रैक्टिस कैम्प.
इस घटना में एक बात यह महत्वपूर्ण है कि एक टीवी एंकर ने कपिल को उनके गुस्से के लिए उनसे यह तक कह दिया कि उन्मुक्त भाग्यशाली है कि कपिल उसके कोच नहीं हैं. जिस वक्त यह एंकर ये बात बोला उस वक्त क्या उसे पता नहीं था कि ये वही कपिल देव हैं जिनकी वजह से आज इंडिया में क्रिकेट कि दीवानगी पागलपन की हद तक है. कपिल देव ने 1983 के क्रिकेट विश्वकप में कप्तानी क़ी थी और पहली बार भारत ने विश्वकप ट्रोफी को छुआ था. देश के लोगों को इस एंकर को कभी माफ़ नहीं करना चाहिए. लेकिन जो पत्रकारीय कार्य को समझते हैं वे जानते हैं कि एंकर को पत्रकारिता के क्षेत्र में रट्टू तोते से बस थोड़ा ज्यादा ही महत्त्व दिया जाता है. इन एंकरों को बहुत कम समय में ही ये गुमान हो जाता है कि वे बुढ्धिजीवी हैं. बिना प्रयास के इनंको उन लोगों से बात करने को मिल जाता है जो अपने क्षेत्रों के महारथी हैं.
मेरी सोच में राजनेताओं के अलावा किसी अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति से इन एंकरों को बात करने की तमीज सिखाने कि जरुरत है. इस बात को एक फील्ड रिपोर्टर भलीभांति समझता है. क्योंकि वह उनके प्रयासों और सफलताओं का चश्मदीद गवाह होता है. एंकर प्रबंधक का पिट्ठू या तोता होता है. इसलिए कपिल देव पर मजाक में ही सही गलत टिपण्णी करने वाले इस एंकर और मीडिया हाउस को भारतीय जनता को दण्डित करना ही चाहिए. इस घटनाक्रम से एक घटना और याद आ रही है वो ये कि हाल में ओलिम्पिक में रजत और कांस्य पदक जीत कर आये कुश्ती के रणबांकुरों सुशील और योगेश्वर का NDTV 24*7 के जानेमाने नाम शेखर गुप्ता ने साक्षात्कार लिया. इस
साक्षात्कार को मैंने बमुश्किल एक दो मिनट ही देखा और चैनल बदल दिया. क्योंकि मुझे ये नागवार गुजरा. इसमे मुझे जो सबसे ख़राब बात लगी, वो ये थी कि शेखर गुप्ता हमारे देश के खेल नायकों से ऐसे जेस्चर (बॉडी लैंग्वेज ) में बात कर रहे थे जैसे शेखर उनका साक्षात्कार लेकर उनपर कृपा कर रहे हों.
अखाड़े के दिग्गज शब्दों के भी खिलाडी हों ये जरुरी तो नहीं. शेखर को यदि खुद का कद बड़ा लग रहा था तो किसी अन्य टीवी जौर्नालिस्ट को भेज सकते थे. वो जौर्नालिस्ट यदि इस
साक्षात्कार को लेता तब भी ये उतना ही दिखाया जाता जितना उनके लेने पर दिखाया गया. यहाँ एक बात कहने वाली है, वो ये कि एडिटर हो या जौर्नालिस्ट वो अनुभव के स्तर पर हमेशा समुद्र किनारे बैठे किसी दर्शक से ज्यादा नहीं होता. पान सिंह तोमर फिल्म का नायक डकैत साक्षात्कार लेने आये जौर्नालिस्ट को उसके कम शारीरिक मेहनत वाले काम को चुनने के लिए सुनाता है तो उसे महज उसकी भड़ास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. सकारात्मक मेहनत का हमेशा सम्मान होना चाहिए. ज्ञान कितना भी महान हो. उसेन बोल्ट जैसी फर्राटा रेसर मशीन बनने के लिए किताबों, बातों और ज्ञान पात्रों को दिमाग में उतारने से कहीं ज्यादा मैदान में दम भरना जरुरी है.
थोड़े भटकाव के लिए छमा चाहते हुए एक बार फिर कपिल पा जी के गुस्से पर लौटता हूँ. उनका गुस्सा सच मायने में मेरा गुस्सा है. उन्मुक्त के यूथ समिट में आने से किसका भला होने वाला था. उन्मुक्त वहां क्रिकेट पर बात करने पहुंचा हुआ था. मेरा आप सभी से सवाल है कि क्या उन्मुक्त इस लायक हो गया है कि वह क्रिकेट पर बोल सके या इस देश के बहुआयामी युवा को बातचीत से प्रभावित कर सके. जबकि अप्रत्यक्ष रूप से वह युवाओं इससे कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से प्रभावित कर रहा है. तो क्या केवल अपने भले के लिए चैनल ने उसके करियर से खिलवाड़ किया और उसको कैम्प में जाने के लिए प्रेरित करने के बजाय अपने कार्यक्रम की टीआरपी के लिए उसका इस्तेमाल किया. ऐसा करके चैनल ने देशवासियों से अनुचित व्यवहार ही किया.
अब बात आती है कि कपिल जी को क्या पड़ी थी कि उन्होंने उन्मुक्त को नसीहत दे डाली. इसका एक ही जबाव है कि एक अनुभवी विशेषज्ञ जब आखों के सामने किसी होनहार को गलती करते देखता है तो वह उस क्षेत्र विशेष के प्रति नैतिक जिम्मेदारी के कारन खुद को ऐसा करने से रोक नहीं पाता. ये कपिल जी का क्रिकेट और देश से प्रेम का सच्चा उदहारण है.
इस सकारात्मक गुस्से को दबाने क़ी नहीं उभारने के जरुरत है. इस पर चर्चा और बहस की जरुरत है.
कपिल जी ने इस प्रकरण के आखिरी में जो बात कही उसको गहरे तक समझने की जरुरत है. उन्होंने कहा की वो उन्मुक्त के कोच होते तो तीन साल और कड़ी मेहनत उन्मुक्त से कराते ताकि वो बीस साल तक राजा की तरह क्रिकेट के खेल पर राज कर सके. ये इस तथ्य को झलकाता है कि विश्वास के साथ की गयी मेहनत का प्रतिफल पूरी ताकत से bounce बैक होता है. इसे जल्दबाजी में कैश करने कि कोशिश आपको आपके प्रयासों से भटकाती है. ये दर्शाती है कि आपके पास आत्मविश्वास कि कमी है. आप लालची हैं. कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते हैं. इतना ही नहीं आपके पास दूर दृष्टि भी नहीं है. क्योंकि आपके बड़े लाभ अदृश्य हैं या आप उनके लिए समर्पित नहीं हैं.
युवा पीढ़ी से माफ़ी चाहते हुए कहना चाहूँगा कि आज यह प्रवर्ति बहुत ज्यादा बढ़ रही है कि आज में जियो, और हो सके तो आज ही सबकुछ हासिल कर लो. कल किसने देखा है. सही है कि कल किसी ने नहीं देखा लेकिन भविष्य इतना कम कम कैलकुलेटिव भी नहीं हो सकता कि इसके लिए कोई रूपरेखा बनाई ही न जा सके. हर युवा आज ही बन संवर जाना चाहता है. जैसे वह किसी काम को करने या शिक्षा हासिल करने नहीं रैम्प पर परेड करने के लिए घर से निकल रहा हो. इसमे कोई बुराई नहीं है. समय हो तो जरूर करो. लेकिन अब प्रश्न उठता है कि तुम्हारे पास इतना ज्यादा समय है कि तुम इन गैर उत्पादक कामों पर इसे खर्च सको. मैंने कई किशोरियों को पार्लर नियमित जाते हुए देखा है. सवाल है कि ये उनके लिए कितना जरुरी है?
आज इस देश का प्रधानमंत्री जोर देकर कह रहा है कि हमारा देश साइंस रिसर्च में चीन से पिछड़ रहा है. इस देश को तकनीकी व अन्य क्षेत्र शोध क्षेत्रों में छात्रों की बड़ी संख्या में जरुरत है. लेकिन युवा वर्ग है कि जो तेरा है, वो मेरा गाने में लगा हुआ है. इस युवा वर्ग को कौन रोकेगा.
यहाँ हमें कपिल देव के गुस्से से सीख लेनी होगी. प्रेरणा लेनी होगी. पहल करनी होगी. युवाओं को उनकी गलतियों पर बिना अपने पराये का भेद किये उन्हें टोकना होगा. हमारे पास अनुभव है और हमारी बात सही होगी तो युवा हमारे इस प्रयास का सम्मान जरूर करेगा. उन्मुक्त को भी कपिल कि फटकार से सबक लेकर ऐसे प्रारंभिक प्रलोभनों से बचाना चाहिए.
मेरी अपनी समझ है कि लड़कियों का सर्वाधिक नुकसान उन्हें सुन्दर बताने वालों ने ही किया है. किसी भाई ने अपनी बहन और किसी पिता ने अपनी बेटी के सौंदर्य की इतनी तारीफ नहीं की होगी जितनी वे लोग करते हैं जिनकी निगाहें पिता और भाई के समान निर्मल नहीं होती. मेरे हिसाब से तो पति भी अपनी पत्नी की इतनी तारीफ नहीं करता, जितनी तारीफ अक्सर अन्य लोग कर जाते हैं. इस व्यर्थ की तारीफ के लिए लड़कियां  अघोषित सौंदर्य प्रतियागिता की होड़ में लगी नजर आती हैं. यहाँ उन्हें कुछ देर ठहर कर सोचने की जरुरत है कि आखिर उनका लक्ष्य क्या है और वे समाज को क्या देने प्रयास में हैं. इसी तरह युवाओं को इस तथ्य पर जोर देने की जरुरत है कि उनके लक्ष्य क्या हैं. उन्हें आंशिक लाभों के पीछे भागना है या जीवन को पूरे विश्वास के साथ एक लक्ष्य पर केन्द्रित करना है.
आज दुनिया में अपंगता का पैमाना ठीक से बनाया जाये अधिकतर युवा वर्ग इसके अंतर्गत आ जायेगा. ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब है. हमने सोचना कम कर दिया है. जीवन जीने के ढंग में मशीनीकरण बढ़ रहा है. हमें ये मानना ही होगा कि दुनिया में हमारे लिए स्वयं हमसे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं है. खुद को महत्त्व देना होगा तभी हम छोटे और लक्ष्य हीन प्रलोभनों से बच सकेंगे.
इस लेख को और भी विस्तार दिया जा सकता है. मूल इतना है कि हमें अब अपने घर के साथ बाहर की भी बुरी बातों का प्रतिरोध करना होगा.
कपिल देव को धन्यवाद... उन्होंने मुझे ये लेख लिखने के लिए प्रेरित किया. कपिल जी का यह गुस्सा यूँ ही दफ़न नहीं हो जाना चाहिए. इसलिए इस बहस को आगे बढ़ाते रहें.

अरुणेश कुमार शर्मा
विशेष संवाददाता
देशबंधु, नयी दिल्ली